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राम ही जीवन

  राम का है नाम सत्य, राम का है काम सत्य राम को जीवन में तुम उतार लो काम क्रोध लोभ अहम, राक्षस यही करो दहन प्रेम त्याग दान को स्वीकार लो ऊच नीच भेद भाव, राम के नही ये भाव दीन को भी प्यार से सँवार दो जान लो अपनी पहचान, आप में छिपे हैं राम स्वयं के राम को पुकार लो, राम ही जीवन।।  

देश मेरा प्यारा भारत,

  देश मेरा प्यारा भारत, लहराये तिरंगा न्यारा शीश मुकुट हिमालय का, चरणों में सागर धारा घूमे हम दुनिया सारी, माँ का आँचल ही प्यारा गूँजता जहाँ कण कण मे, राम नाम का जयकारा चाहत थी कुछ पाने की , ख्वाबों के महल बनाने की, पर ख्वाब में आते है अब तो, वही नुक्कड गलियाँ चौबारा। देश मेरा प्यारा भारत, लहराये तिरंगा न्यारा शीश मुकुट हिमालय का, चरणों में सागर धारा घूमे हम दुनिया सारी  माँ का आँचल ही प्यारा गूँजता जहाँ कण कण मे  राम नाम का जयकारा परदेश में धन और मान मिला, जीवन थोडा आसान मिला, पर मात पिता की सेवा को, तरस गया दिल बेचारा देश मेरा प्यारा भारत,लहराये तिरंगा न्यारा शीश मुकुट हिमालय का, चरणों में सागर धारा घूमे हम दुनिया सारी, माँ का आँचल ही प्यारा गूँजता जहाँ कण कण मे,  राम नाम का जयकारा मिट्टी की सौंधी खुशबू जब जब याद आ जाती है, कहता है मन वापस चल क्यों फिरता है बंजारा। देश मेरा प्यारा भारत, लहराये तिरंगा न्यारा शीश मुकुट हिमालय का, चरणों में सागर धारा घूमे हम दुनिया सारी , माँ का आँचल ही प्यारा गूँजता जहाँ कण कण मे,...

पर्यावरण पर कविता

  पर्यावरण धरा पर आज ये कैसा मानव ने है विष घोला, खाँसता हुआ कंबल से नीला अंबर यू बोला। श्वेत दुग्ध जल नदियाँ श्याम होकर वो खोंई, पवन मदमस्त बहती थी दूषित होकर वो रोई। पंक्षी ढूँढ रहे सारे कंक्रीट के वन में आशियाना, कहीं तो पेड मिल जाये हमें थोडा है सुस्ताना। कहते देव हे मानव विरासत में तू सब पाया, ये अधिकार है तेरा तुझे बस याद यही आया। कहती है माँ प्रकृति खुशी खुशी सब देती हूँ, अपने बच्चो की समृद्धि में हर्षित हो लेती हूँ। विनाशी तांडव तुम्हारा ,पर मुझको नहीं भाता है, नदियों को नाले बनते देख, दिल मेरा रो जाता है। जब वृक्ष जंगल के कटते, मुझको आवाज लगाते है, पशु-पक्षी भी अपने मेरे, मेरे सामने प्राण गँवाते हैं। सागर, पर्वत, धरती, अंबर सब पर मानव भार बढ़ा, तरक्की करते करते तुमको, नशा अहंकार का चढा। नीर बिका समीर बिका, मानव का अब ज़मीर बिका, धन की खातिर मेरे बच्चो, मेरा सारा चीर बिका। विनती बस इतनी यही अपनी माँ पर अब रहम करो, प्रकृति की खुशियों की खातिर थोडी मुश्किल सहन करो। स्वस्थ तन स्वस्थ मन मिलेगा जीवन से हर रोग घटेगा, सब को खुशिया देकर ब...

हमारे देश का झंडा

  विषय , * हमारे देश का झंडा , विधाता छंद *। धरा पर प्रेम बरसाता,हमारे देश का झंडा अमन का दूत कहलाता, हमारे देश का झंडा विजय की राह दिखलाता, हमारे देश का झंडा सुनाता ओज की गाथा, हमारे देश का झंडा दुश्मन देख घबराता, हमारे देश का झंडा हृदय को जीत ये जाता, हमारे देश का झंडा सभी के हाथ लहराता, हमारे देश का झंडा तिरंगा शान कहलाता, हमारे देश का झंडा शालिनी गर्ग

योद्धा है तू भूल मत जाना,

  योद्धा है तू भूल मत जाना, गिरने से तेरी हार नही , उठना ही तेरी फितरत है , यूँ रुकना तुझे स्वीकार नही। पासे का बस खेल है ये , कभी एक दिया कभी छह दिया , मेहनत किस्मत चमके कभी , किस्मत ने मुख फेर लिया।  सपने रहे आधे या पूरे , सपने तो कल तक बदलते है , रात के देखे हुये सपने , अरे सुबह को कहाँ टिकते हैं , पथ नही जीवन का सीधा , कभी सीधी राह बढ़ता नही। योद्धा है तू भूल मत जाना , गिरने से तेरी हार नही , उठना ही तेरी फितरत है , यूँ रुकना तुझे स्वीकार नही। भरे पेट व्यंजन की थाली , वो स्वाद कहाँ दे पाती है , प्यास लगी हो तभी जिह्वा , पानी का स्वाद बताती है। मत सोच हाथ से क्या फिसला , ये देख प्रभु से क्या मिला , तन मन बुद्धि पर गर्वित हो , अपने गुणों का दीप जला , विश्वास खुद पर ही तेरा , दिखलायेगा तुझको राह सही। योद्धा है तू भूल मत जाना , गिरने से तेरी हार नही , उठना ही तेरी फितरत है , यूँ रुकना तुझे स्वीकार नही। मातपिता की चाह यही , संतान सुखी और स्वस्थ रहे , स्वाभीमान भरा हो जीवन , धन वैभव का न कष्ट सहे। जीवन एक परीक्षा है हर कदम पर ये तो टकरायेगी , ...

बढ़ती हुई जवानी,

  .. दिग्पाल छंद (२२१ २१२२) बढ़ती हुई जवानी, हमको सता रही है शुरुआत है नई ये, शायद बता रही है जुल्फे बहुत उडाई, अब बाल उड न जाये, लट बाँध कर उड़ो अब, उड़ना सिखा रही है। मस्ती भरी चली जो, वो चाल भूल जाओ, संभाल के रखो पग, पल-पल जता रही है। घंटो ऩजर मिलाई, पलकें नही झुकाई, ऐनक चढी नजर अब, नयना चिढ़ा रही है। जो अंग थे फ़ड़कते, वो अंग दर्द करते, अब मूव ही सहारा, ये ही जिता रही हैं। तकलीफ़ से ड़रो ना, मुस्कान को न खोना, स्वीकार कर खुशी से, अनुभव बढ़ा रही है। बढ़ती हुई जवानी, हमको सता रही है शुरुआत है नई ये, शायद बता रही है शालिनी गर्ग      

बातों के ये बताशे

  हर दिल को है प्यारे लगते, बातों के ये बताशे, आओ हँसकर बोलेचाले, गम आयेगा कहाँ से। बैठ अकेले मोबाइल पर, क्यूँ उँगली खिसकाओ, घर से थोडा निकलो बाहर, खुलकर चौपाल लगाओ, सतरंगी किस्सो के तारों, को धरती पर बुला लो गुलगुलों की चाशनी में, उनकों थोडा पका लो। मीठे मीठे होकर भी ये, शूगर से बैर कराते, हर दिल को है प्यारे लगते, बाँतों के ये बताशे। आओ हँसकर बोलेचाले, गम आयेगा कहाँ से। मूवी रैस्ट्रा में हम जाते, घर आकर पछताते, सेहत और पैसा दोनो को, यारो हम है गँवाते, मस्ती वाली महफिल क्यों न, घर में चलो सजाये, गपशप करते करते मिलकर, हम पकवान बनाये,  झूमें नाचें गाये सारे, कर लें थोडे तमाशे। हर दिल को है प्यारे लगते, बातों के ये बताशे, आओ हँसकर बोलेचाले, गम आयेगा कहाँ से। शालिनी गर्ग    

बस में नही रहता मन मेरा

  बस में नही रहता मन मेरा मन की बस चली पडती है न कंडकटर न टिकट पर ड्राइवर पाँच रख लेती है  भटकटी फिरती इधर उधर कभी इस डगर कभी उस डगर ख्वाहिशों का नगर दिखाती चारो ओर से लुभाती भोला मन भी ललचाता जिद करता और बाहर आता  पर मन को कहाँ ये खबर पूरा न होगा ये सफर  

हरा श्लेष अलंकार

  जख्म को कर दिया हरा, यादों नें कुरेद कर वक्त ने हरा दिया हमें, अपनी हर चाल भेदकर जब भजा हरि को ह्रदय से, हर दुख मेरा हर लिया खुशियों का रंग हरा, जीवन में फिर भर दिया     

स्वयं के राम को पुकार लो

  राम का है नाम सत्य, राम का है काम सत्य राम को जीवन में तुम उतार लो काम क्रोध लोभ अहम, राक्षस यही करो दहन प्रेम त्याग दान को स्वीकार लो ऊच नीच भेद भाव, राम के नही ये भाव दीन को भी प्यार से सँवार दो जान लो अपनी पहचान, आप में छिपे हैं राम स्वयं के राम को पुकार लो, राम ही जीवन।।  

लिखती हूँ मैं छंद (कृपाण घनाक्षरी)

  विषय- कृपाण घनाक्षरी  ह्रदय में उठते द्वंद, भरती भाव सुगंध, लिखती हूँ मैं छंद, कलम से मंद मंद।  कभी लिखूँ प्रेम रंग, कभी जीवन की जंग, कभी कल्पना तरंग, कभी गुजरा प्रसंग। पढ पढ होती दंग, गाती भी मै संग संग, दुख नहीं करे तंग, बढती आशा उमंग। हौसले होते बुलंद, मन में बसे आनंद, लगे खाया कलाकंद, जब भी लिखूँ मैं छंद।  

दिल के दरवाजे लगाये

  दिल के दरवाजे लगाये, उस पे कुंडी भी चढाये, ताला हैवी हमने लगाया, फिर भी तुमको दिल में पाया। कब्जा दरवाजे का तोड़ा, दिल पे क़ब्ज़ा करके छोड़ा। हार गये हम दिल की बाज़ी, बाजीगर को सजन बनाये। दे रहा है जग ये सारा ,अब हमें शुभकामनाये।।

पान की गिलौरी से पिया

  गीतिका छंद २१२२ २१२२ २१२2 २1२ पान की मीठी गिलौरी, से पिया हमको लगे, देखते ही रंग धानी, प्रीत के सपने जगे। जानते थे कत्था चूना भी मिलेगा साथ में, चाबनी भी है सुपारी जो फँसेगी दाँत में। हाय मधु गुलकंद सी मुस्कान पे हम क्युँ बिके, रंग बदले प्रीत के अब, लाल ही बस पी दिखे।।   

सबसे महान कौन

सबसे महान कौन देखी एक सभा निराली,हर कोई विद्वान । अलग अलग विचार थे, सब में भरा था ज्ञान ।। अपने अपने ज्ञान का था सब में अभिमान, अलग अलग रूप सजा,अलग अलग परिधान। पानी ,नीर, तोय सलील, अंबु और जल, सबसे महान कौन है, निकालना था हल। पहला कहे कहता मैं सत्य सबसे बडा है पानी, पानी से ही रची है सृष्टि की अमर कहानी। पानी से बडा न कोई न पानी के समान, केवल पानी ही देता इस जीवन को प्राण। दूजा कहे जग की मिटाता ये ही केवल पीर, अमृत सा निर्मल करता नाम है बस नीर। ये ही आदि ये ही अनंत केवल इसको जान, नीर नीर कहता चल कर अपना कल्याण। तीजा कहे नाम छोटा पर सबसे ज्यादा बल , तरल भी ये सरल भी ये, ये है अमृत जल। इसका आचमन कर दे पल में जीवन सफल, सुधार सकता ये ही केवल, तेरा आने वाला कल। चौथा कहे बताया देर से ये दोष न देना मोय, निष्कंटक सुगम राह पर ले जाता है बस तोय। मन की तृष्णा बुझाये, पावन भी कर जाये, पाप तुम्हारे सारे पिछले चुटकी में बहा जाये। पाँचवा कहे सुनना मेरी छोटी सी ये दलील, निर्गुण अविनाशी सब में बसता ये तो है सलील। आकार नही है पर ये ही है जग का आधार, बात मेरी मान लो ये ही जीवन का सार। छठा कहे ये सारे छोट...

दुर्गा नवरात्री के पर्व पर

  दुर्गा माँ के नवराते , नौ देवी दर्श कराते, व्रत हवन पाठ से, मैया तुम्हे  बुलाते। पहली माँ शैलपुत्री, दूजी ब्रह्मचारिणी, तीजी माता चन्द्रघंटा,के गुण हम ध्याते। कुष्मांडा है चौथी देवी, पाँचवी है स्कंधमाता, छठी दुर्गे कात्यानी का, दरबार सजाते। आँठवी है कालरात्रि, नवी दुर्गे महागौरी, पूज नव दुर्गे रूप, सौभाग्य हम पाते। शालिनी गर्ग