रुक्मिणी की प्रेम पाती
सार छंद
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विदर्भ राज भीष्मक जी की, रुक्मिणी थी दुलारी,
नारद मुनि से कृष्ण कथाएँ, सुनती
थीं वो सारी।
अद्भुत मनोरम छवि सुंदरम, हृदय में
थी उतारी,
कामना यही पलपल बढ़ती, उन पर जाऊँ
वारी।।1।।
बिटिया के वर गिरधर नागर, राजा यही
चुने थे,
गिरधर ने भी नाम रूप गुण, रुक्मिणी के
सुने थे।
विधाता भी जीवन के खेल, अजब-गजब
दिखलाए,
भाई रुक्मी शिशुपाल संग, बहन विवाह
रचाए ।।2।।
नहीं सहूँगी अनर्थ भैया, कहती राजदुलारी,
दुष्ट पाल को नहीं वरूँगी, मृत्यु मुझे है प्यारी।
बहते अश्रु देख बिटिया के, राजा जी चिल्लाए,
जिद्दी रुक्मी पिता बहन को, नजरबंद करवाए ।।3।।
अश्रु सूखे थम गई धडकन, याद आए बिहारी,
लिख रही हूँ प्रेम की पाती, ओ मेरे बनवारी।
भेज रही हूँ दूत ब्राहमन, दर्द हृदय का लिखकर,
देर न करना आना जल्दी, पाती मेरी पढकर ।।4।।
हे केशव बिन देखे तुमको, मैने प्रेम किया है,
तुमरी लीला के हर रस का, मैने घूट पिया है।
पिया बनाया तुमको अपना, बिन पूछे बनवारी,
हे माधव इस अबला की है, अब ये लाज तुम्हारी ।।5।।
चरणकमल की धूल तुम्हारी,है बस मुझको प्यारी,
दासी की विनती अब सुन लो, मोहन मदन मुरारी।
जल्द साँवरे मुझको अपनी, एक झलक दिखला दो,
या निर्लज्ज कहकर वंशीधर, मुझे आप ठुकरा दो ।।6।।
मोहन की जोगन का न अब, दूजा कोई होगा,
सिंह के बदले सियार ब्याहे, ऐसा कैसे होगा।
बन नृसिंहा चेदीराज को, उसके घर पहुँचाओ,
पिंजरे में तडपती मैना, आकर उसे छुडाओ ।।7।।
कितने जन्मों से नारायण, पूजा करी तुम्हारी,
सुनो अच्युतम तप के फल की, चाहत है अब भारी।
विवाह करो किसी भी विधि से, मेरी माँग सजा दो,
अजय हो संपूर्ण विश्व में, सबको आज बता दो ।।8।।
चाह नही गोविंद युद्ध की, बहे रक्त की धारा,
युक्ति भली यही लगती है, कर लो हरण हमारा।
माखन चोर कान्हा तस्कर, कहती दुनिया सारी,
रुकमनी हरण की नटवर, आई है अब बारी ।।9।।
दुल्हन बनी पूजने देवी, मंदिर में जाऊँगी,
हे स्वामी प्रियवर मेरे यदि, आपको न पाऊँगी।
सत्य कहती शपथ ये लेती, प्राण वहीं जाएँगे,
लिखे शब्द जो पाती में बस, ये ही रह जाएँगे ।।10।।
शालिनी गर्ग 16 जून 2026
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