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ये मेरा दिल किससे बना है

  ये दिल है मेरा, हाँ ये दिल है मेरा, शीशे का नहीं जो पल में टूट कर चकनाचूर हो जाये, न प्लास्टिक का जो छोटी मोटी बातों पर चटक जाये। न कागज़ का जो आसानी से फट कर बिखर जाये, मोम का भी नहीं जो पिघल कर यूँ आँसू बहाता जाये। न पत्थर जैसा कठोर जो हर चोट बरदाश्त कर जाये, ये दिल है रबर का हाँ ये मेरा दिल है रबर का थोड़ा सा  मुलायम, थोड़ा सा लचीला, न बहुत सख्त है न बहुत हठीला। हर चोट को आसानी से पार कर जाता है, आहत के तीरों को अपने में समाता है। सब भूल कर वापस फिर से मुस्कुराता है, ये दिल है रबर का हाँ ये मेरा दिल है रबर का।  शालिनी गर्ग

मकर संक्राति कैसे मनी रवि और अवनि की प्रेम कथा

  एक था सजना एक थी सजनी एक था सजना एक थी सजनी, नाम थे उनके रवि और अवनि। रूठ गया था सजना कहीं जाकर, छुप गया था कहीं मुँह फुलाकर। अवनि सरदी से जम रही थी, नब्ज भी जैसे थम रही थी। रवि जी इतने नखरे क्यूँ करते, पहले भी तो थे हम पे मरते। एक पल ना नजर हटाते थे, प्रेम की अग्न से तपाते थे। सावन के मस्त महीने में, लुक छिप कर प्यार जताते थे। मेहनत के कमाये बादलों से, प्रेम सुधा का जल बरसाते थे। हरी चूड़ियाँ पहनकर मैं भी, फूलों की चुनरी ओढती थी। सजधज कर दुल्हन बनकर, बस आपका चेहरा तकती थी। पर अब क्यों रूठे हो पिया, खफ़ा खफ़ा से अजी दिखते हो। कुछ पल यहाँ दर्शन देते हो, ना जाने किस पर मरते हो। मैं श्वेत हिम शोल ओढकर, मुँह को छिपाती रहती हूँ। कब घर आएँगे पिया मेरे, इसी सोच में डूबी रहती हूँ। गलती हुयी जो माफ करो जी घर आ जाओ अब सैंया जी। अब 14 जनवरी आती है सैया रवि कहता है मान गया मैं ओ मेरी अवनि, तुम हो प्राण प्यारी संगिनी। तुम से दूर ना जा पाऊँगा, वापस लौट के घर ही आऊँगा। देखी जो झलक प्रिय रवि की, अवनी के हृदय में छाई शांति। ख...

गोपी गीत (हिंदी में)

  गोपी गीत ( हिंदी में ) रचयिता शालिनी गर्ग इंदिरा छंद 11121221212 ब्रज धरा हुआ, जन्म आपका, ब्रज निवास बैकुंठ धाम सा। मृदुल श्री प्रिया , आपकी रमा , प्रभु यहीं करें , संग आपका ।।1.1।। छिप गये कहाँ, साँवरे सखे, चरण धूल में, प्राण हैं पड़े। भटकती फिरें , नाथ दासियाँ। पकड कान को, माँग माफियाँ।।1.2।। हृदय में बसे, प्रेम से प्रिये, कमल नैन से,घायल किये। प्रभु कहो जरा,प्रीत क्या नहीं, वध किया बिना,अस्त्र के यहीं।।2।। असुर मारते, मारते रहे, ब्रजधरा सदा, तारते रहे।   रक्षक गोप के, आप ही रहे, हँस दिये सदा, नाचते रहे।।3।। तुम लला बने, मात के लिये, चक्र उठा लिया, विश्व के लिये। हृदय में सभी, जीव के बसे, जगत ये चले, कृष्ण आप से।।4।। तुम हरो हरि S , कामना सभी, शरण पड़े जो, आपके कभी। अभय देत हो, जन्म मृत्यु से, जब रखो कृपा, हस्त शीश पे ।।5।। दुख मिटा दिये, शांत श्याम ने, मद चुरा लिये, प्रेम ज्ञान ने। किशन रूठ के, ना सताइये, नमन आपको, मान जाइये।।6।। चरण आपके, पाप को हरें, कमल वासिनी भी यहीं रहें।   पग धरें कभी, नाग सर...

चाय पर प्रेम कहानी

  चाय पर प्रेम कहानी वो हमारी पहली मुलाकात,  मेरा तुम्हारा और चाय का साथ,  देखा तुमने मुझे पहली बार और पूछा  क्या पसंद है तुम्हें मैने कहा चाय, और तुमने कहा चाय पर पहले आप। फिर क्या, मिल गये हम चाय की तरह, तुम जल से निर्मल, मैं दूध सी कोमल,  और डल गई दोनो के प्रेम की मिठास, पीते साथ साथ, सुबह हो,शाम हो, चाहे हो रात। धीरे धीरे मुझे अदरक की चीनी वाली,  तुम्हें इलायची की शक्कर वाली भाने लगी, प्रेम की बातें अब बच्चों की शिकायतों पर आने लगी, पर एक सुकून तुम्हारे और मेरे चेहरे पर होता था। इन शिकायतो मे भी प्यार का इजहार तो होता था। समय बीता अब तुम्हे ग्रीन टी हैल्दी लगने लगी, पर मैं अपनी अदरक वाली स्वीटी पर ही डटी रही, तुम्हे अब चाहिये था पानी में एक उबाल, टी बैग और हनी, पर मेरी चाय तो सदा से रझती हुई अदरक वाली ही बनी,  चुस्कियो का स्वाद अब अलग अलग सा होने लगा,  तुम सिप लेने लगे मेरा घूँट तुम्हे ओल्डफैशन लगने लगा,  तुम अखबार से मोबाइल, मोबाईल से नैटफिलिक्स पर आ गये,  मैं कल क्या बनेगा, इस पर ही अटकी रही,और चाय पीती रही। पर सुबह,शाम, रात का मेर...

मदिरा सवैया छंद ( श्रंगार रस )

  चंचल नैन मिले जब से मन भूल गया अपनी अखियाँ। मस्त हुआ उनकी धुन पे मन भूल गया अपनी बतियाँ। चाहत की एक ड़ोर बँधी मन भूल गया अपनी सखियाँ। झूम रहा अब प्रीत भरा मन भूल गया अपनी गलियाँ।

हाइकु( एक शब्द अलग अर्थ से बने )

  हाइकु 1.सजना मेरा सजना एकटक यूँ देखे मेरा सजना 2.सजा घर है सजा आजाओ अब जल्दी ना दो यूँ सजा 3.मान 1 बात ये मान तू करना हमेशा बड़ों का मान   2 बात ये मान ना करना तू कभी काया का मान 4.पता मुझे पता है तुम्हारा आजकल कहाँ पता है। 5.धरा कहती धरा सब रह जाएगा इधर धरा 6.राज करोगे राज गर रखोगे गुप्त हमारा राज 7. हार दिलो की हार होने पर मिलता फूलों का हार 8. बाल आते है बाल तो झड़ने लगते सिर के बाल 9.घडी स्मार्ट है घड़ी कहती है चलना क्यूँ हर घडी          

स्कूल के दिन

  ये स्कूल के दिन हम कहो कैसे भूल पायेंगे ये दोस्ती की कश्ती हम अब किधर पायेंगें दिल के बस्तों में अब यादों के मोती सजायेंगें ये दिन यारों लौट लौट कर हम   याद आएँगे ये स्कूल के दिन हम कहो कैसे भूल पायेंगे ये दोस्ती की कश्ती, हम अब किधर पायेंगें जल्दी जल्दी उठना और जल्दी जल्दी नहाना जल्दी जल्दी से टाई को गले में लटकाना बस को पकड़ने के लिये जल्दी जल्दी भागना और जूते के फीतों को तो बस में ही बाँधना इन सब झमेलो से तो सही है बच जाएँगे ये स्कूल के दिन हम कहो कैसे भूल पायेंगे ये दोस्ती की कश्ती, हम अब किधर पायेंगें क्लास में बहानों की भी पाठशाला चलती थी नये नये बहाने पर दोस्तों की दाद मिलती थी टीचर भी सब जानकर अंजान बनती फिरती थी सारे बहानों की सजा रिपोर्टकार्ड में ही दिखती थी पर वो बहानों की माला अब किसको पहनाएँगें ये स्कूल के दिन हम कहो कैसे भूल पायेंगे ये दोस्ती की कश्ती हम अब किधर पायेंगें ब्रेक के टाइम का कितना इंतजार रहता था टिफिन तो ब्रेक से पहले ही उड लेता था कैंटीन की धक्कामुक्की में बाजी जो जीत लेता था, वही तो हम सबकी शाबासी का ...