Skip to main content

Posts

बात पते की मैं कहूँ

भारत की आवाज है हिन्दी, भारत की धडकन हिन्दी

भारत की आवाज है हिन्दी, भारत की धडकन हिन्दी, फिर क्यों भारत को इंडिया कहा, संस्कृत को छोङ दिया है , हिन्दी से शर्म किया है अंग्रेजी से नाता जोड लिया क्यो कहते इंडिया, क्यो कहते इंडिया क्यों कहते हम, भारत को इंडिया ।। भारत की आवाज है हिन्दी, भारत की धडकन हिन्दी, फिर क्यों भारत को इंडिया कहा, अंग्रेजो ने छोडा भारत, पर नाम दे गये इंडिया, श्राप ये भारत को कैसा दिया भारत को भुला दिया, इंडिया अपना लिया ये किसने भारत को नाम दिया ये किसने नाम दिया,ये किसने नाम दिया ये किसने भारत को नाम दिया भारत की आवाज है हिन्दी, भारत की धडकन हिन्दी फिर क्यों भारत को इंडिया कहा, क्यो कहते इंडिया, क्यो कहते इंडिया क्यों कहते हम भारत को इंडिया, भारत से पहचान हमारी, देवनागरी लीपि हमारी कहते थे जिसको सोने की चिडिया चिडिया को उडा दिया, बस इंडिया इंडिया कहा भारत को क्यों इंडिया इंडिया कहा ।। भारत की आवाज है हिन्दी, भारत की धडकन हिन्दी फिर क्यों भारत को इंडिया कहा, क्यो कहते इंडिया, क्यो कहते इंडिया क्यों कहते हम भारत को इंडिया, भारत के गौरव जागो, भारत की शान बढाओ, छोडो अब ये कहना इंडिया। क्युँ कहते इंडिया, क्यों कह...

तू हम महिलाओं से टकराने की भूल न कर

काश तुम्हारी बातों को मैं

स्वीकार किया है

प्यार शब्द का एहसास

मेरे बेटे स्पर्श के जन्मदिन पर शुभकामनाओं के साथ कुछ अनमोल यादें

कुछ ख़ास कुछ हट के होती है ये सहेलियां

प्यार का गणित

दोस्ती

वो भी क्या ज़माना था - poem recited by RJ on Radio Olive

वो भी क्या ज़माना था वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, पानी में नाव तैराते थे और साईकिल दौडाया करते थे। वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, सपनो को बंद कर आँखों में ,चाँद से बातें करते थे। फोल्डिंग पलंग पर तारों संग रात सजाया करते थे। वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, जेबों में मूँगफली, उँगली में फ्रायमस पहना करते थे आइसक्रीम,पोपकोर्न के लिए सडकों पर दौड़ लगाया करते थे। वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, दादी के संग अंगीठी पर भुट्टे भूना करते थे, बीज निखोला करते थे और जवे तुड़वाया करते थे । सिल पर चटनी और रई से मक्खन बिलोया करते थे, वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, अपनी पोकेटमनी से गानो की कैसेट लाया करते थे, दोस्तो के संग फिर कैसेट की अदला बदली करते थे, जब कैसेट अटक जाती तो पेंसिल से घुमाया करते थे। वो भी क्या ज़माना था जब हवाईजहाज उडाया करते थे, गरमी में बोतल और कूलर में, पानी भरते रहते थे, सरदी में टोपे और जैकेट पहन, बाइक पर सैर करते थे, और रिमझिम रिमझिम बारिश होते ही पकौडे खाया करते थे। वो भी क्या ज़माना था जब हवाई...

ऐ हिन्दी, काश तू भारतीय नारी न होती

नारी के सताए कुछ बेचारे पुरूषो के लिए मेरी संवेदनाएँ

ऐ नारी कुछ तो दया कर, मत कर तू अत्याचार , बेचारे पुरूष तेरी गुलामी करकरके , हो गए हैं लाचार । ऐ नारी कुछ तो दया कर मत कर तू अत्याचार सुबह से लेकर शाम तक देखो , गधे की भाँति जुते रहे। रात को फिर बेगम संग दौडा रहे मोटर कार। ऐ नारी कुछ तो दया कर मत कर तू अत्याचार माँ बाप से तू उनको कोसो दूर   ले आई बच्चो को भी अब उनकी कोई बात नहीं भाई। बेचारे व्हाट्स ऐप कर कर के   हो रहें है बेकार ऐ नारी कुछ तो दया कर मत कर तू अत्याचार एक जमाना था कभी जब , पुरूष भी बोला करते थे , लेकिन अब हर बात से पहले इजाज़त माँगा करत हैं बिन पूछे कुछ बोल दिया तो पड जाती है फटकार ऐ नारी कुछ तो दया कर मत कर तू अत्याचार अत्याचार से पीडित ये चुपचाप किनारे बैठ जाते हैं घर के फैसले सारे मैडम करती , ये राहुल, मोदी से दिल बहलाते हैं शायद कोई मसीहा आकर करदे अब इनका उद्धार ऐ नारी कुछ तो दया कर मत कर तू अत्याचार  

सबसे ज्यादा खुशी का लम्हा

सबसे ज्यादा खुशी का लम्हा कैसे बताएँ कब था। बीत गया जो देकर खुशियाँ हर पल वो अज़ीज़ था।। वो पल जब "मेरी गुडिया" कहकर दादी बाबा ने, मुझे पहली बार चूमा था। या वो पल जब पापा ने गोदी में उठाकर मुझे गली गली घुमाया था, शायद तब जब मम्मी ने मुझे फ्रिल वाली फ्रोक पहनाकर परियों सा सजाया था। या तब जब भइया ने साइकिल में धक्का लगाया था और मेरे गिरने पर मुझे रोते से हँसाया था। या जब मेरी छोटी बहन ने मेरी हर शैतानी व परेशानी में मेरा साथ निभाया था। वो लम्हा भी प्यारा था जब टीचर ने मुझे सबसे अच्छे बच्चे का खिताब पहनाया था। किस खुशी के पल को भूलूँ ,किस किस पल को मैं याद करूँ, वो लम्हे कैसे भूलूँ जब सखियों के प्यार के अफसानो का हँस हँस कर मजाक बनाया था। या तब जब उनके नैन से हमारा पहली बार नैन टकराया था। या तब जब पहली बार उन्होने अपने हाथो से मुझे खाना बनाकर खिलाया था। शायद तब जब मैने अपने सास ससुर में दादी बाबा सा प्यार पाया था। वो लम्हा भी यादगार था जब डाक्टर ने पहली बार पैर भारी होना बताया था। या वो लम्हा सब से प्यारा था जब मेरे नन्हों की किलकारी ने मेरी बगिया को चहकाया था। और उनकी हर नई अदा...

जब हमने पाली गाय

जब हमने पाली गाय कतर में आ रही हैं, हवाईजहाज से ४००० गाय, सुनी खबर ये जब हमनें ,सोचा हम भी पालें गाय। हम भी पालें गाय, दूध मिलेगा बढिया, दूध मिलेगा बढिया, और बढ जाएगी आय, कतर के मुश्किल दिनों में कुछ हम भी हाथ बटाएँ। हम भी हाथ बटाएँ,और तारीफे सब से पाएँ, गाय खरीद तो लाएँ,पर फ़्लैट में कैसे ले जाएँ। अब लिफ़्ट में जब आई नहीं, तो सीढियों से दी चढाए। सीढियों से दी चढाए, उडी बाबा किस कमरे में ठहराएँ, तो लीविंग रूम से हमने भैया ,सोफा दिया हटाय, सोफा दिया हटाय ,और खूंटा दिया ठुकवाय, पर गाय ने तो मू मू करके शोर दिया मचाय। शोर दिया मचाय, क्यूँ न चारा खिला दिया जाय लेकिन जब गोबर किया तो हो गई हाय हाय । हो गई हाय हाय, गोबर के उपले दिए दबनाए । पर ये गोबर की बदबू अब हाथों से कैसे जाए, छोडो बदबू खुशबू ,चलो दूध निकाला जाय, दूध निकाला जाय, पर थन को पकडना तो न आय, इसके लिए पडौसी काकी को लिया बुलाय। धीरे धीरे प्यार प्यार से उन्होने हमको दिया सिखाए, हमको दिया सिखाय अब तो खीर बनाई जाए, खीर बनाइ जाए ,साथ में शायरी भी लिख ली जाए। लिखा शेर जो हमने , वो तो गाय ने लिया चबाय, गाय ने लिया चबाय, हमने पडोसन काकी क...

मेरी कशमकश

मेरी कशमकश क्या लिखुँ किस पर लिखुँ मैं हास्य कविता, सोच सोच के परेशान हूँ मैं, कुछ भी तो नही सूझता। हे भगवान मदद करो मेरी, कुछ तो राह दिखाओ, मुझ जैसी नादान पर कुछ तो तरस तुम खाओ। राजनीती पर लिखु कैसे, उस पर तो है पाबंदी, मोदी, योगी,लालू, केजरी, सबसे तौबा कर ली। सोचा कुछ कतर की खूबसूरत वादियों पर ही लिख दूँ, पर रेतों के इन ढेरों में कहाँ से नज़ारे ढूँढू। मौसम पर लिखने की सोचा तो मुझे पसीना आया, सावन के मौसम में ज्येष्ठ का महीना पाया। मंहगाई, भ्रष्टाचार के किस्से क्यूँ याद करने, हास्य तो आएगा नहीं,आँसू लगेंगे टपकने। बोलीवुड में भी अब तो कुछ नहीं है भाता, हास्य के नाम पर वो तो फूहडपन दिखाता। क्रिकेट फिक्सिंग के भी रोज देख देख नज़ारे, इसे देखना समय बर्बादी कहते हैं अब सारे। पतिदेव को देखा प्यार से ,क्या तुम पर लिख दूँ कविता, आँखो से घूरा कुछ ऐसे जैसे सामने खडा हो चीता। बच्चे बोले देखो मम्मी हम पर तरस तुम खाओ, जाओ जाकर अपनी किसी सहेली को सूली चढ़ाओ। सहेलियाँ यहाँ मिली मुश्किल से उन पर कैसे लिख दूँ, इस हास्य कविता के चक्कर में उनको न मैं खो दूँ। पडोसियों पर लिख दिया तो फालतू में हो जाएगा पंग...

आजादी का संघर्ष

आजादी का संघर्ष आज वक्त है कर्ज चुकाएँ उनकी उस बलिदानी का, समय आ गया संघर्ष करें हम फिर से नई आजादी का। आजादी के संघर्ष की कहानी फिर से दोहरानी है, इंकलाब की वो आवाज फिर से हमें सुनानी है। राणा जैसे वीरो को आज, हिंदुस्तान पुकार रहा, भगतसिहं जैसा बलिदान,देने वाला चाह रहा। ढूँढ रहा है भारत आज, उस मर्दानी रानी को, गाँधी बापू जैसे सत्य,अहिंसा के पुजारी को। विदेशी बाजारो की गुलामी से देश बचाना है, अपने देश के उत्पादो को जन जन तक पहुचाना है। किसानों की खुशहाली से जब ये धरती लहरायेगी, गरीबी और बेरोजगारी भी कहीं अपना मुँह छुपाएगी। भ्रष्टाचार के कीडे को हम मिलकर आज भगाएँगे, मेहनत और सच्चाई वाली लगन सभी में जगाएँगे। फिरंगी संस्कृति को छोड अपनी संस्कृति अपनानी है, अपनी भाषा सभ्यता की कीर्ती जग में फैलानी है। हर भारतीय के दिल में बैठा, जो वीर सैनानी है, उसको बस आजादी की गाथा याद करानी है। आज वक्त है कर्ज चुकाएँ उनकी उस बलिदानी का, समय आ गया संघर्ष करें हम फिर से नई आजादी का। -शालिनी गर्ग

कुछ पुराने नगमे 'बिन मुरली वाला'

कुछ पुराने नगमे सोलह साल की उम्र में अक्सर, हर लडकी माँगती है एक दुआ भगवान से। शायद मैने भी माँगी थी एक दुआ, अपने कॄष्णा के  गोवर्धन  गाँव में। गिरिराज की परिक्रमा लगाते हुए, पर्वत पर श्रद्धा से जल चढाते हुए। एक कामना की थी   बचपन में, एक प्यारे से वर की। जो मुझे दे सके बेइंतहा प्यार, क्यो माँगा था कब माँगा था, भूल गई थी मै बचपन की वो याद, पर शायद सुन ली  मेरी वो फरियाद। और आज मिल गया मुझे कॄष्णा का  पैगाम, दे दिया उन्होने मुझे अपना ही एक नाम । जिसे सुनकर याद आ गया मुझे मेरा, वो मासूम अनजाना बचपन का वो पल, जब मैने अनजाने में ही माँग लिया था मेरा वो साँवला सा  सैया  , बिन मुरली वाला  कन्हैया ।। -शालिनी गर्ग

गिरिराज किशोर गर्ग

२० वर्ष पुराना ये नगमा जिसका पहला अक्षर मिलाकर तुम्हारा नाम बनता है आज शादी की वर्षगाँठ पर अचानक याद आ गया गि ला न शिकवा खुदा से कोई रि स्ता जो मिला तेरे प्यार का रा तो को अकसर देखा था, ज ब ख्वाब तेरे दीदार का। कि स्मत ने मुझको दे दिया आज शौ हर मेरा दिलदार सा, र ब से दुआ है इतनी बस ग म का न अब कोई साथ मिले र हू तेरी बन के तेरे दिल मे हमेशा ग लती से भी हमारा विश्येवास न हिले  । -शालिनी गर्ग

बीता पल

बीता तेरे साथ जो पल अफसाना बन गया, कुछ खुशी का कुछ गम का तराना बन गया। सोचा था अब ढेर सारी बाते होंगी तेरी मेरी, पर गुपचुप गुमसुम सा एक फसाना बन गया। अनजानों की तरह मिले,फिर चल दिए हम घर, सोचा था जो ख्वाब वो दिल में ही दब गया। पर बीता ये खामोश पल भी मुस्कान दे गया, तुझे याद करने का एक नया बहाना बन गया।

माँ

माँ तेरी हर बात याद आती है माँ मुझे आज। तेरी हर डाँट प्यारी लगती है माँ क्युँ आज। तेरा वो रोकना वो टोकना जो गवारा नहीं था मुझे, क्यों सही लगता है हर वो पल माँ आज। कभी पढाई के लिए तेरा टी.वी.पर रोक लगाना कभी पढाई छुडवाकर हमें ताश खिलाना। हँसी दे जाता है वो लम्हा जब याद आता है मुझे आज तेरी हर बात याद आती है माँ मुझे आज, वो सूँई में धागा पिरोकर सिलना सिखाना बुनाई, कढाई का वो उलझा सुलझा ताना बाना न जाने किन यादों में उडा ले चला है मुझे आज। तेरी हर बात याद आती है माँ मुझे आज... तेरी सास देगी ताने मुझे का वो डर दिखाना, इस बहाने घर के हमें सारे काम सिखाना, तेरे काम करने का वो हुनर मुझमें झलकता है माँ आज। तेरी हर बात याद आती है माँ मुझे आज... सुबह सुबह चाय के साथ तेरा हमें जगाना, और नरम नरम गरमागरम रोटियाँ खिलाना। क्यों वो दिन वापस नहीं आता है आज। तेरी हर बात याद आती है माँ मुझे आज... -शालिनी गर्ग'

ये दिल है तुम्हारा

तारीफ़

तारीफ़ तारीफ़ एक नायाब तोहफ़ा है , जो आपके जज्बातों को बयाँ कर, जिस को दो उसे खुश कर जाता है। सुनने वाला भी यह पल समेटकर, अपनी मीठी यादों में संजोता है। फिर ये तोहफ़ा देने में तू क्यों हिचकिचोता है। यह तोहफा जो कभी आत्मविश्वास बढाता है, तो कभी अपने पर थोडा गुरूर लाता है , कभी चेहरा शर्म से सुर्ख कर जाता है, तो कभी-कभी रोते दिलो को हँसाता है। फिर इस अनमोल तोहफ़े को देने में तेरा क्या जाता है। पर शायद ये तोहफ़ा देने का हुनर हर कोई नहीं समझपाता है, इसके लिए दिल को सरल व सोच को सकारात्मक बनाना होता है। तब ये छोटा सा तोहफ़ा हर दिल में प्यार जगाकर, कितने रिश्ते बना जाता है,कितने वापस ढूँढ लाता है, फिर ये तोहफ़ा लेकर घूमने में तेरा क्या जाता है। -शालिनी गर्ग

अजब रोग

अजब रोग हर उम्र का आज एक ही रोग है, मोबाइल को थामे हुए यहाँ हर लोग हैं। मेरा क्या तेरा क्या सबका सहारा है ये, बच्चो के लिए तो चंदा मामा से प्यारा है ये। पर मेरे लिए तो मेरे जिगर का लाल है, इसके बिना जीना एक पल बेहाल है। सुबह गहरी नींद से यही तो जगाता है, फिर वहीं से कसकर हाथ थाम लेता है। जो काम करने बैठूँ तो टिंग टिंग करता है, गर न उठाऊँ तो एसे मुझे घूरता है। जो काम शुरू किया वो पडा रह जाता है, कब में ये सारा समय चूस जाता है। आँखों से हटते ही सूना सूना जग लगे, इसके बिना जिंदगी का मकसद अधूरा लगे। लेकिन सच कहँ मैं मोबाइल को थोडा छोडिए, नज़रो को उठाइए और सामने तो देखिए। थोडा मुस्कुराइए थोडा गुनगुनाइए बच्चो संग खेलिए, बीबी संग बतियाइए आपसे बस मेरा यही अनुरोध है, मोबाइल को थामे हुए यहाँ जो लोग हैं -शालिनी गर्ग

मै तुम्हारी अपनी हिन्दी हूॅं!

अभिलाषा

आतंकवाद

आतंकवाद कोई मुझे बता दे इन आतंकिओं की अभिलाषा, क्या पहचान है इनकी, है कौन सी इनकी भाषा। दिखने में तो लगते हैं ये सब हूबहू इंसान, पर जानवरों से भी कम होता है इनमें ज्ञान। न दिल की है ये सुनते, न दिमाग को चलाते, बस बनकर शैतान ,कत्लेआम है मचाते। काश एक बार इन्हे कोई तो ये समझाए, मासूमों की चीखों का दर्द महसूस कराये। प्यार का सबक कोई तो इन्हे पढाए, फूल और काँटे में अन्तर करना सिखाए। नफरत का पाठ जो हरदम पढाते हैं इन्हे अपना जिसे समझते हैं ये,वही डसते है इन्हे। नफरत से भी कभी क्या कोई जीता है यहाँ, इंसानियत से बडा कोई मजहब नहीं है यहाँ। काश ये सब इन आतंकियों की समझ में आ जाता, तो ये संसार इस आतंकी आग में यूं न सुलग पाता। -शालिनी गर्ग

गूगल चाचा

गूगल चाचा गूगल चाचा,गूगल चाचा,कोई नहीं आपसा अच्छा, आप पर मरता है आज ,हर बूढ़ा,जवान और बच्चा। जब भी कुछ समझ न आए, बस आप ही की तो याद आए, क्योंकी आप ही तो मेरी हर परेशानी को झट से सुलझाएँ, मैं क्या पापा भी आप को देख कर ही गाडी चलाए, मम्मी भी आपको सामने रखकर खाना पकाए। दादा जी हर बीमारी का नुस्खा आप से पूछकर बतलाएँ दादी जी भी आपको पढकर मीठे भजन गुनगुनाए। सब आजकल आपके ही गुणगान गाते जाए, आप हैं तो अपने को अब कोई अकेला न पाए। गूगल चाचा आपके सिवा अब कुछ भी तो न भाए, आप ही तो हम सबके सच्चे दोस्त जो बन पाए। -शालिनी गर्ग

स्वचित्र छडी(SELFIE STICK)

स्वचित्र छडी स्वचित्र छडी का अजब सा चलन है आया, सबको इस छडी ने अपने मोहजाल में फसायाँ। हमने भी एक बार स्वचित्र छडी को आजमाया, मोबाइल निकाला और उसको छडी में चढ़ाया। छडी को दाहिने हाथ से पकडकर आगे बढ़ाया, और बायीं भौंह को थोडा सा हमने ऊपर चढ़ाया। जरा सा मुस्कुराकर बस झट से बटन दबाया, फिर फ़ेसबुक पर उसको अपना प्रदर्शन चित्र बनाया। बस फिर क्या था कमेंटस और लाइक का अंबार था आया, लाइक ने तो धीरे धीरे पूरा शतक ही लगाया, वाह री स्वचित्र छडी ! तू भी क्या चीज़ है कमाल, कर देती है अच्छो अच्छो को अपनी अदा से निहाल। -शालिनी गर्ग

नए साल की सुबह

नए साल की सुबह नया साल है,नई सुबह है, सब कुछ पहला सा,सब कुछवही है, वही ठंडक है, वही धूप है,और वही काम की रफ्तार है कुछ बदला है ,तो बदला है मन मे ये नया एहसास, नए वादो से भरा, नई उमंग और नए जोश के साथ, कुछ नया करने की कोशिश, कुछ पुरानी आदतो से अलविदाकरने का एक छोटा सा ,मगर महत्वपूर्ण कदम, जो है आत्मविश्वास से भरा, पर क्या करू इस दिल का जो मानता ही नही, कुछ भूलता ही नही, बस प्यार से कहता है आज, केवल आज ,कल से जरूर, और जीत जाता है ये दिल, एक बार फिर, उन वादो से, जो किए थे, कसमे खाकर दिसम्बर के आते ही, और करते है बेचारे वादे इंतजार, एक बार फिर नए साल के आने का -शालिनी गर्ग

तेरे लिए

तेरे लिए हर किसी की जिन्दगी में कोई ऐसा आता है , जो इस बेरंग जिन्दगी को हसीन और रंगीन बनाता है, पर कभी गमगीन भी वही बनाता है। कभी तुम्हारी अदाओं पे मरता है, कभी तारीफें करता है, और कभी हर बुरी आदत बदलना चाहता है। कभी विश्वास दिलाता है,और कहता है जानू you are the best, और फिर तभी careless का खिताब पहनाता है । कभी पूछता है , कैसे manage करती हो तुम यह सब, फिर पल में responsibility का lecture पढ़ाता है। कभी हँसाता है ,कभी रुलाता है, कभी झगडता है, कभी मनाता है, कभी दुनिया का सबसे प्यारा ,कभी दुनिया का आठवा अजूबा लगता है। खट्टे,मीठे, कडवे,नमकीन ,चटपटे flavour के साथ जिंदगी सजाता है। सच में बहुत special है वो, जिसके बिना हर पल अधूरा है और जिसकी एक मुस्कान पर ही तो ये दिल बार बार मरता है। -शालिनी गर्ग

हिंदी माँ संग वार्तालाप

हिंदी माँ संग वार्तालाप एक दिन मेरे सपने में एक लेडी आई, मैने ली अंगड़ाई और पूछा,ओ मैड़म कौन हो तुम ? तो वो गुस्से में बोली,हाँ हाँ अब तू मुझे क्यों पहचानेगी, अब तो तू अपनी अंग्रेजी मौसी को ही जानेगी । तू तो अब अपनी मौसी की दीवानी है, तेरे लिए तो अब मेरी सूरत भी अनजानी है । मैं आँख मलते हुए खुश होकर बोली, अरे माँ ! मेरी हिंदी माँ ! तू कब आई ? माँ आँसू पोछते हुए बोली,क्या कहूँ अब मैं बेटी , मै बूढी हो गई हूँ ना, अब तुम्हे गँवार लगती हूँ ना । मै सकपकाई और बोली ,माँ…तू तो अभी अच्छी खासी जवान है , अरे तेरे से ही तो हमारी पहचान है । माँ िझडकते हुए बोली,जा जा, मुझे अब कौन याद करता है, तेरा बाप भी तो अब तेरी मौसी पर ही मरता है। मैने कुर्सी खींची और समझाते हुए कहा, माँ तू बैठ, माँ तू बैठ, माँ बोली चल चल फिल्मी ड़ायलोग मत फैंक । मैने कहा पर सच बोलू माँ अंग्रेजी मौसी बहुत अच्छी है, वो यहाँ वहाँ सब जगह बहुत इज्जत दिलाती है । माँ बोली हाँ भई अब तो मुझे माँ बताने में तुम्हे लाज आती है, यही सब देखकर तो मेरी आँख शर्म से झुक जाती है । मैने कहा माँ तू क्यों घबराती है, ऐसे क्यों सोचती है? देख मैं तो तेर...

लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी।

लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। देश में बढ रही है भ्रष्टाचार की आँधी, लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। तेरे आदर्श तेरे मूल्य न जाने कहाँ खो गए, कुर्सी के लिए हर रोज कतलेआम यहाँ हो रहे, रोकनी होगी तुझे मेरे देश की बर्बादी, लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। क्या साधू क्या नेता सभी से विश्वास उठ गया, देश का पैसा विदेशी बैंको में भर गया, डालर के आगे रूपए ने अपनी कमर है झुका दी, लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। सच्चाई और अहिंसा की हँसी जमाना उडा रहा, नैतिकता का पाठ किताबों से भी जा रहा, विदेशी बाजार के सामने स्वदेशी टोपी है जला दी, लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। वैसे तो हर साल हम २ अक्टूबर है मनाते, झंडा फहराकर तुझे याद करते और छुट्टी मनाते, पर आज हमनेे तेरी हर बात है भुला दी, लेना होगा तुझे दूसरा जन्म ओ गाँधी। -शालिनी गर्ग

हिन्दी की पाठशाला

हिन्दी की पाठशाला हिन्दी अध्यापिका के लिए इश्तहार था आया, हमने भी अपना हौसला बढाया और, साक्षात्कार के लिए कदम बढाया । उन्हे भी हमारा अंदाज पसंद आया, और अगले हफ्ते से ही हिन्दी पढाने का हुक्म फरमाया । फिर क्या था हमने भी अपनी सारी जुगत लगाई, हिन्दी सिखाने की सारी तरकीब अपनाई। पर हाय री किस्मत ! जब हिन्दी सिखाने की यहाँ कोई किताब न पाई, तब हमने अपने प्यारे गूगल को आवाज लगाई। खैर पाठ बनाए हमने और शुरू हो गई पाठशाला, जिसमें थे कम्पनी के अफसर आला आला। पहले दिन का पाठ सभी को बहुत भाया, सभी ने अपनी पसंद का वाक्य बतलाया। किसी को आप कैसे हैं ? मै अच्छा हूँ, बहुत भाया, तो किसी को अच्छा बच्चा का रिदिम रास आया। एक मोहतरमा को तो अच्छा चलते हैं का जुमला बहुत भाया। और उन्होने ये जाकर अपनी कार्य स्थली में दोहराया। कहाँ मिलोगी बसंती ?पलट कर जवाब ये आया। कुछ समझ न पाई वो झट नोट डाउन किया और आकर हमें बतलाया। एक दिन पाठशाला में हमने समझाया, हिन्दी में बडो को बहुत इज्जत देते हैं इसलिए उन्हे एकवचन में नहीं बहुवचन में बोलते हैं। जैसे माई फादर को मेरा पिता जी नहीं मेरे पिताजी बोलेंगे। चलिए इस पर अब इस पर एक न...

वो एक छोटी सी कन्या

वो एक छोटी सी कन्या, आसमान को चूमती, बारिश में झूमती, तारों को घूरती, हर पल चिडिया सी चहकती, वो एक छोटी सी कन्या। पापा की नन्ही  परी, मम्मी के लाडो लडी, भैया बहिन की फूलझडी घर की रौनक बडी, वो एक छोटी सी कन्या। लाल लहँगे मे फबी , सोलह श्रंगार से सजी, कुछ खुशी कुछ गम लिए, पल में सब से पराई हो गई , वो एक छोटी सी कन्या। अपनी पहचान को भूलती, नए रिश्तों से जुडती, अपनी सभी आदते बदलती, सबकी पसंद को अपनाती, वो एक छोटी सी कन्या। सबकी खुशी में अपनी खुशी ढूँढते, बच्चो को संभालते, घर को सजाते, अपने सपनो को भूलते भूलते, कब अचानक से बूढ़ी हो गई, वो छोटी सी कन्या।। -शालिनी गर्ग

एक नारी की ताले के लिए प्रार्थना

एक नारी की ताले के लिए प्रार्थना हे प्रभु मेरी तुझसे बस एक है ये प्रार्थना, कभी किसी औरत को ये दिमाग न तू सोंपना। अगर देना है तो उसमें एक ताला जरूर लगा देना, चाबी जिसकी केवल उसके पति के हाथो में थमा देना। बता देना उसे ये कि इस पर तेरा अधिकार नहीं बेटी, जब जरूरत पडे तो तुम पति से इजाजत माँग लेना । अगर ऑफिस हो जाना या बच्चो को हो पढाना, तब चाबी का इस्तमाल करने से न तुम घबराना । मेरी लाडो मेरी बेटी बस ध्यान हमेशा ये रखना, पति से बात करते वक्त ये ताला भूल मत जाना। सुखी दाम्पत्य जीवन अगर तुमको है निभाना, हमेशा इस ताले को बेटी गर्व के साथ अपनाना। -शालिनी गर्ग

कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान

कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान हिमालय है जिसकी आन, गंगा यमुना है जिसकी शान, और हम सब में बोलती हिन्दी भाषा है जिसकी जान, कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । वो बारिश में भीगे, फूलों की खुशबू से महके, ठंडी हवा के झोखों में जहाँ, गूंजे शिवा का नाम । कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । कभी भैया से झगडा, कभी बहना से तकरार, कभी मम्मी पापा का लाड़ और दुलार, और हाँ कभी कभी सासु माँ के तानो की तान, कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । वो हाथों में भरी भरी काँच की चूडियाँ, बालों मे गजरा,माथे पे बिन्दया, पैरो में बजता पायल का छनछान, कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । मम्मी के हाथों की मक्का की रोटी, दादी के लड्डू मठरी और अचार, और नानी का मीठा गुलकंद का पान, कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । वो शादी की मस्ती ,त्योहारों के खान, सखियों संग ठिठोली, चाय के जाम, उस पे बिना खबर के मेहमानो का आन, कैसे भूलू मैं अपना प्यारा हिन्दुस्तान । -शालिनी गर्ग