कहानी 19
शीर्षक: गीता
का इतिहास और "युगों की गणना
दादाजी और राहुल सर्दी के मौसम में आँगन
में बैठकर धूप सेंक रहे हैं । (हल्की-हल्की
धूप उनके चेहरे पर पड़ रही है।)
राहुल (आँखें मिचमिचाते हुए धूप की ओर देखता है):
दादाजी, ये सूरज
कितना अच्छा लगता है ना! सूरज हमें रोशनी भी देता है और गर्मी भी देता है । अगर
सूरज ही न हो तो... कितना मुश्किल हो जाएगा ना जीना!
दादाजी (मुस्कुराकर): बिलकुल
बेटा। अगर सूरज न हो, तो जीवन
तो असंभव ही हो जाएगा।
पौधे सूरज की रोशनी से ही अपना खाना बनाते हैं —तुमने पढ़ा
होगा क्या कहलाती है यह विधी?
राहुल : दादाजी फोटो सिनथैसिस।
दादाजी: हाँ हिंदी में इसे प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं,
और अगर ये नहीं होगा तो पौधे ही नहीं होंगे,
पौधे नहीं होंगे तो
जानवर और हम इंसान भी कैसे जीवित रहेंगे?
राहुल (मजाकिया अंदाज में ): पानी
पीकर?
दादाजी: पानी भी तो बरसात से आता है और बरसात कौन लाता है?
राहुल: बादल, दादाजी मुझे पता है बादल कैसे बनते हैं?
सूरज ही तो समुद्र के पानी को भाप बनाकर बादल बनाता है, जो फिर बारिश बनकर धरती पर
आता है।
दादाजी: अब जाने सूरज की कीमत?
राहुल (आश्चर्य से): तो
दादाजी, सूरज तो
भगवान की तरह हुआ ना?
दादाजी: हाँ बेटा, इसलिए हम
सूरज को सूर्यदेव
कहते हैं — देवता मानते हैं। पूजा करते है और सुबह को सूरज
को जल चढ़ाते हैं।
और राहुल क्या
तुम्हें पता है, भगवान
श्रीकृष्ण ने गीता का पहला ज्ञान भी सबसे पहले सूर्यदेव को ही
दिया था।
राहुल (हैरानी से उछलते हुए): क्या
कहा ! गीता का ज्ञान पहले सूर्यदेव को?
लेकिन दादाजी, वो तो प्लैनेट है चलिए आपके लिए देवता कह देता हूँ — पर अर्जुन के जैसे इंसान तो नहीं
है ना ?
दादाजी (गंभीर होकर): बेटा, सूर्य देव सभी ग्रहों के मतलब प्लैनेट के राजा
है सभी लोको में ग्रहों में उनका प्रकाश और ऊष्मा पँहुचती है। और क्योंकि सूर्यदेव राजा हैं तो उनका एक नाम भी है विविस्वान ।
राहुल (हँसते हुए): अच्छा सूर्यदेव का नाम भी है।
दादाजी: ये
सब मै अपने मन से नहीं कह रहा हूँ, भगवान
श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता के अध्याय 4 के पहले श्लोक में बताया है —सुनो यह श्लोक
(दादाजी श्लोक
पढ़ते हैं)
"इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवान अहमव्ययम्।
विवस्वान मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत्।।"
इसका अर्थ है
इस अमर योग विद्या को मैंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को दिया, फिर विवस्वान ने मनुष्यों के पिता मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया।
राहुल (जिज्ञासा से): दादाजी, इसमें तो और भी लोग हैं...
ये मनु और इक्ष्वाकु कौन हैं?
दादाजी:
मनु
सूर्यदेव के पुत्र थे और मनु सभी
मानवों के पिता कहलाते हैं ।
मनु
के नाम से ही हम सबको 'मानव' कहा गया है। तो ये हैं मनु और फिर मनु ने यह ज्ञान अपने
पुत्र इक्ष्वाकु को दिया
— जो रघुकुल के पूर्वज थे।
राहुल (खुश होकर): दादाजी रघुकुल!
मतलब राम जी का वंश? “रघुकुल
रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई”। है ना दादा जी।
दादाजी (हँसते हुए सिर हिलाते हैं):हाँ सही
कहा ! भगवान राम ने उसी रघुकुल में जन्म लिया।
राहुल(आश्चर्य से): तो दादाजी
जैसे आप मुझे गीता का ज्ञान दे रहे हैं,
वैसे ही इन लोगो ने
अपने-अपने बच्चों को ये ज्ञान दिया ?
दादाजी: सही कहा बेटे। ये ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। गीता
का ज्ञान सिर्फ अर्जुन के लिए नहीं है — यह हर युग के लिए है। यह ज्ञान सनातन है, अविनाशी है — समय
बदल सकता है, युग बदल
सकते हैं, लेकिन
इसका ज्ञान वही रहता है इसका सत्य वही
रहता है ये नहीं बदलता।
इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हमें ये गीता का अनमोल ज्ञान
सबको बाँटना चाहिए।
(दादाजी राहुल को देखते हुए) राहुल,
तुम्हे पता है इस श्लोक के बाद अर्जुन ने भगवान से तुम्हारी
तरह एक प्रश्न किया था।
राहुल: अच्छा मेरे जैसा, (आश्चर्य से )क्या
प्रश्न किया अर्जुन ने भगवान से?
दादाजी: अर्जुन पूछते
हैं कि आपका जन्म तो मेरे जन्म के साथ इसी युग में हुआ है फिर आपने
सूर्य देव को कैसे और कब गीता सुनाई ?
राहुल: हाँ दादाजी प्रश्न तो सही पूछा अर्जुन
ने, और भगवान क्या उत्तर देते हैं?
दादाजी: भगवान कहते हैं बहुत युगो पहले अर्जुन।
राहुल: वो कैसे?
दादाजी: अर्जुन भी यही पूछते हैं वो कैसे? भगवान कहते हैं-- हे अर्जुन! तुम्हारे तथा
मेरे अनेको जन्म हो चुके हैं|,मुझे तो उन सबका स्मरण मतलब याद रहता है, किन्तु तुम्हें अपने पिछले जन्मों का याद नहीं रह सकता है।
राहुल: वो क्यों दादाजी?
दादाजी: हम जीव आत्मा हैं, हमें अपने पिछले जन्म याद नहीं रहते।
लेकिन
भगवान परमात्मा हैं — वे अपने हमारे हर जन्म को , हर आत्मा को , हर युग को जानते हैं।
राहुल (धीरे से): तो भगवान को मेरा भी सब
पता है?
दादाजी (प्यार से सिर पर हाथ रखते हुए): हाँ
बेटे, तुम्हारा
भी मेरा भी — और हर किसी का सबका पता है
भगवान को, क्योंकि वे परमात्मा रूप में हम सबके अंदर रहते हैं।
इसलिए हमें भगवान पर सदा विश्वास रखना चाहिए। और उनके गीता
के ज्ञान को समझने का प्रयास करना चाहिए।
राहुल (आँखों में सूरज जैसी चमक के साथ): दादाजी, मुझे नहीं पता था कि गीता
का ज्ञान इतने युगो पुराना है!
दादाजी : राहुल तुम्हे युग पता है
क्या होते हैं?
राहुल (थोड़ा सोचते हुए): दादाजी, युगों
का अर्थ समय की बहुत ...बडी अवधी।
दादाजी : चलो अभी तुम्हे युगों के
बारे में समझाता हूँ तो,
चार युग होते हैं — और हर युग में भगवान अवतार लेते हैं।
राहुल (आश्चर्य से): चार
युग! कौन-कौन से होते हैं?
दादाजी
1.
सतयुग —जो सच्चाई और तपस्या का युग था , धर्म का युग था । सतयुग में
भगवान ने अनेक अवतार लिए थे । जैसे मत्स्य अवतार , कच्छप का अवतार , वराह और नरसिंह का अवतार ।
2.
त्रेतायुग —ये युग मर्यादा और आदर्शों का युग था , जिसमें भगवान राम ने अवतार लिया था।
3.
द्वापरयुग — ये महाभारत वाला संघर्ष का युग था
राहुल - जहाँ भगवान कृष्ण
ने जन्म लिया था।
4.
कलियुग —ये यही युग जिसमें हम अभी जी रहे हैं। इसमें धर्म
सच्चाई कम हो गई है स्वार्थ बढ़ गया है इस युग के अंत में कल्कि अवतार आएँगे।
राहुल: दादाजी, मैंने "कल्कि अवतार" पर एक फिल्म
देखी थी! बहुत अच्छी थी!
दादाजी (हँसते हुए): हाँ
बेटा, पर वो फिल्में कल्पना पर आधारित होती हैं।
असली ज्ञान तो हमें शास्त्रों से मिलता है।
राहुल: दादाजी, ये युग कितने लंबे होते हैं?
दादाजी : हर युग की अपनी आयु होती है।
सबसे छोटा युग है — कलियुग — इसका
समय है 4 लाख 32 हजार वर्ष।
राहुल (अंग्रेज़ी में): Four hundred
thirty-two thousand years? इतना लंबा....
दादाजी: सही!और कलियुग का दो
गुना है द्वापरयुग । अब बताओ — द्वापरयुग कितना लंबा हुआ?
राहुल (थोड़ी सोच के बाद): Eight hundred
sixty-four thousand years! ?
दादाजी (प्रसन्न होकर): मतलब 8,64,000! आठ लाख चौसठ ह़ज़ार वर्ष
शाबाश! अब त्रेतायुग — ये कलयुग का तीन गुना है, बताओ त्रेतायुग कितना लंबा हुआ?
राहुल (गिनते हुए): Three times? Umm…
Twelve lakh ninety-six thousand years
यानि 12,96,000 वर्ष?
दादाजी: बिलकुल सही! यानि 12,96,000 बारह लाख छियानवे हज़ार वर्ष,
और अब सतयुग — ये चार गुना होता है कलियुग का।
राहुल (सर पकड़ते हुए):ओहो, अब
तो मुझे पेपर और पेन चाहिए!
दादाजी - चार गुना मतलब… Seventeen
lakh twenty-eight thousand years!
17,28,000 वर्ष!
दादाजी: सत्रह लाख अठाइस हज़ार वर्ष । (हँसते हुए ) गणित तो आज
अच्छा सीख जाएगे बहुत अच्छा कर रहे हो आज!
अब थोडा सा और करो अब इन चारों को जोड़ दो — सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग।
राहुल ( खुश हो जाता है और बोलते हुए लिखता है):
कलयुग 4,32,000 + द्वापर युग 8,64,000 + त्रेता युग 12,96,000 + सतयुग 17,28,000 = हुआ
43,20,000 वर्ष —मतलब Four
million three hundred twenty thousand years!
दादाजी (सराहते हुए): 4.32, million
years कह सकते हैं।
बहुत अच्छे! ये होता है एक चतुर्युग।
राहुल (चौंककर): ओह! ये तो बहुत लंबा समय
है।
दादाजी, अभी तो कलियुग चल रहा है — इसमें
कितने साल हो गए?
दादाजी: इस समय कलियुग के केवल 5,000 वर्ष ही बीते
हैं,
राहुल दादाजी एक मिनट राहुल कैलकुलेट
करके कहता है मतलब अभी Four hundred twenty-seven thousand years 4,27,000 वर्ष बाकी हैं!
राहुल (आँखें चौड़ी करते हुए): उफ्फ!
यानि अभी तो शुरुआत है!
दादाजी (धीरे से): हाँ
बेटे। और चतुर्युग के आगे का जानना है?
राहुल: इसके आगे भी होता है?
दादाजी: अब ध्यान से सुनो, , ऐसे एक नहीं 71 चतुर्युग मिलकर एक "मन्वंतर" बनता है।
राहुल (धीरे से दोहराता है): 71 चतुर्युग
= 1 मन्वंतर
दादाजी: और 14 मन्वंतर मिलकर ब्रह्मा
जी का एक दिन बनता है।
राहुल (सिर खुजाते हुए): दादाजी, अब
तो मेरा सिर चकरा रहा है…
दादाजी (हँसते हुए): अरे तू
तो आज गणित का योद्धा बना हुआ है! थोडा और गुणा जोड तो कर....
राहुल (आश्चर्य से): नहीं वो नहीं करना
मुझे आप बस ये बता दीजिए— ब्रह्मा जी का
एक दिन ये कितना बड़ा होता है —
दादाजी : चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष
— इसे कहते हैं कल्प।
राहुल (आश्चर्य से): Four billion… three
hundred twenty million years!!
ओफ्फो! और हमारा जीवन…?
दादाजी (ध्यान से): हमारा
जीवन तो उसमें से बस 100 साल बहुत ही छोटा सा होता है बेटा।
राहुल (धीरे से मुस्कुराते हुए): दादाजी, आपने
तो आज मेरे सामने समय का पूरा ब्रह्मांड खोल दिया!
दादाजी (आँखों में चमक लिए): और बेटा
—"जिसे युगों का ज्ञान हो जाए, उसे अपने जीवन की कीमत समझ आ जाती है।"
राहुल : दादाजी शालिनी गर्हग मारा
जीवन तो बहुत ही छोटा सा है इसका मतलब बस सौ साल लगभग
दादाजी: इसलिए हमें भगवान के दिए जीवन का सदुपयोग करना चाहिए।
और हम सृष्टि की बहुत छोटी सी चीज हैं इसलिए हमें घमंड नहीं
करना चाहिए।
राहुल : दादाजी अब अंदर चलिए — आज की धूप और ज्ञान
दोनों भरपूर हो गए।
दादाजी: (हँसते हुए) हाँ राहुल सही कहा, चलो राहुल
अब तुम आराम करो और मैं भी।
शालिनी गर्ग

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